पद्मावती बखेड़ा: क्या करणी सेना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है?

क्यों कर रही है करणी सेना पद्मावती फिल्म को लेकर इतना हंगामा? क्या वाकई इस फिल्म में रानी पद्मावती को गलत तरीके से दर्शाया जा रहा है?

Amit Bajaj November 22, 2017 at 5:15

भाजपा का एक दुखड़ा है कि मोदी सरकार के ढेरों अच्छे कार्य उनके चंद नामाकूल  संगी-साथी दलों की करतूतों के कारण छुप जाते हैं। अब पद्मावती फिल्म को लेकर इस राजपूती करणी सेना ने किये हुए बखेड़े को ही ले लीजिये। अंतर्राष्ट्रीय संस्था मूडीस ने दो दशकों के बाद भारत की रेटिंग में सुधार किया। लेकिन प्रेस और सोशल मीडिया में इस खुशखबरी के बजाय करणी सेना की करतूतों का बोलबाला है।

करणी सेना पद्मावती विवाद
आखिर करणी सेना को आपत्ति किस बात पर है?

गौरतलब बात यह है कि पद्मावती फिल्म तो अभी रिलीज़ भी नहीं हुई, और कुछ चुनिंदा लोगों को छोड़कर किसी ने यह फिल्म देखी तक नहीं है। और करणी सेना के किसी सदस्य ने तो नहीं ही देखी है – कम से कम मैनें तो किसी करणी सेना वाले को यह कहते हुए नहीं सुना है कि उन्होनें फिल्म देखी है, और फिल्म के फलाने हिस्सों पर उन्हें आपत्ति है।

तो सवाल यह उठता है कि अगर इन लोगों ने फिल्म देखी नहीं है, तो यह हंगामा कर किस बात पर रहे हैं? पद्मावती के निर्देशक संजय लीला भंसाली कई बार इस बात का स्पष्ट कर चुके हैं कि पूरी की पूरी फिल्म में राजपूतों के शौर्य और वीरता को ही दर्शाया गया है।

जिन्हें संजय लीला भंसाली की फिल्मों का थोड़ा बहुत भी ज्ञात है, उन्हें तो भंसाली की पुरानी फिल्मों के के अंदाज़ से ही समझ जाना चाहिए था कि पद्मावती में भंसाली राजपूतों और खासकर पद्मावती की वीरता को घटाकर नहीं, बल्कि अच्छा ख़ासा बढ़ाकर ही बड़े पर्दे पर पेश करेंगे। अगर भारत की परंपरा, कला और संस्कृति को बड़े पर्दे पर, बड़े पैमाने पर बखूबी उतारने में बॉलीवुड में कोई निर्देशक सक्षम है, तो वो भंसाली ही हैं। चाहे ‘हम दिल दे चुके सनम’ हो  या फिर ‘बाजीराव मस्तानी’, मराठा और और गुजराती आनबान और शान को भंसाली ने अपने निराले अंदाज़ में भव्य रूप से दर्शकों के सामने पेश किया।

बाजिराओ मस्तानी का तीर वाला दृश्य
बाजीराव मस्तानी के इस दृश्य में बाजीराव अपने अचूक निशाने को दर्शा रहे हैं

एक और सोचने वाली बात यह है कि भंसाली कोई आर्ट-फिल्म निर्देशक नहीं हैं। राजपूत की वीरता का गौरवपूर्ण इतिहास सिर्फ राजपूतों के लिए ही नहीं, सभी भारतवासियों के लिए एक संवेदनशील मुद्दा है। भंसाली अगर अपनी फिल्म में अल्लाउद्दीन खिलजी की नाक ऊँची करते हैं और राजपूतों की छोटी, तो वो भूल जाएँ, कि इस देश में उनकी फिल्म बॉक्स ऑफिस में कोई कमाल दिखाएगी। भंसाली भारत कला जगत के मंझे हुए खिलाड़ी हैं और इस बात से अनभिज्ञ नहीं हो सकते। अगर वो यह गलती करते हैं, तो करणी सेना से अच्छा सबक उन्हें बॉक्स ऑफिस से मिल जायेगा। उनकी फिल्में बड़े बजट वाली होती हैं, और एक भी बड़ी व्यावसायिक विफलता उन्हें तोड़ देने का सक्षम रखती है।

अब बचा मुद्दा एक स्वप्न का। कहीं से तो यह खबर बाहर आयी कि पद्मावती फिल्म के एक दृश्य में अल्लाउदीन खिलजी अपने स्वप्न में पद्मावती के साथ प्रेम-प्रसंग करते दिखते हैं। इस बात को भी खुद भंसाली ने और फिल्म के अन्य कलाकारों ने साफ़ नकारा है। फिल्म रिलीज़ होने वाली है, और मुझे नहीं लगता कि इतने दिग्गज निर्देशक और कलाकार पूरे देश को इस बात पर झूठ बोलेंगे। वैसे भी, क्या राजपूती मान-मर्यादा की बुनियाद इतनी कमजोर है कि एक फिल्म के स्वप्न-प्रसंग उसको इतना झकझोड़ देगा?

इन बातों से यह काफी स्पष्ट होता है कि करणी सेना बेफजूल के एक मुद्दे को उठाकर अपना सियासी पुलाव पका रही है। ‘जोधा अकबर’ के रिलीज़ के समय भी इन्होनें कोशिश की थी, और अब फिर कर रहे हैं। जब जनता इस फिल्म को देखेगी, तो करणी सेना का झूठ पूरी दुनिया के सामने खुद ही जाएगा। अंतराल में यह जरूरी है कि मीडिया करणी सेना को ज्यादा तजबू न दें ।

करणी सेना जैसे नकारात्मक दलों की इस देश को कोई जरूरत नहीं है, और वो अगर खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने पर उतारू हैं, तो यह सबके लिए अच्छा ही है।

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